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मुंबई में महीनो से फुटपाथ पर रहकर गुज़ारा कर रहे हैं कैंसर मरीज, खाने के पड़े है लाले

हमारे देश में कैंसर से पीड़ित मरीजों की संख्या काफी अधिक है। इन मरीजों का उपचार करवाने के लिए अनेक सामाजिक संस्थाओं समेत सरकारी भी काफी सुख सुविधाएं पहुंचाती रहती है। इसी प्रकार की एक सुविधा मुंबई के भी टाटा मेमोरियल अस्पताल में कैंसर से पीड़ित मरीजों के लिए दी जाती है। बताया जाता है कि मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में कैंसर से पीड़ित मरीजों का काफी कम खर्च में उपचार किया जाता है।

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स्वाभाविक रूप से कैंसर के उपचार में कम खर्च आने के कारण देश के कई राज्यों में से गरीब लोग इस अस्पताल में उपचार करवाने के लिए आते हैं। उन मरीजों का उपचार तो ठीक से हो जाता है परंतु उन्हें यहां पर उपचार करवाने के दौरान कई कई दिनों तक रुकना पड़ता है। इन मरीजों को और उनके परिजनों को मुंबई जैसे बड़े शहर में खाने-पीने और रहने की अन्य सुविधाएं काफी महंगी होने के कारण फुटपाथ पर ही रहना पड़ रहा है।

बिहार से आए हुए एक कैंसर रोगी की परिजन सुमित्रा ने यहां का अनुभव साझा करते हुए कहा कि “हमने अब तक अपने पति के इलाज पर 2.5 लाख खर्च कर चुके हैं। हम यहां 4 महीने से अधिक समय से रह रहे हैं और बहुत कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। हमारे पास अस्पताल में एक कमरे के खर्च के लिए पैसे नहीं हैं।” इसके साथ ही ग्वालियर से आए हुए एक मरीज जितेंद्र ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब लोग उन्हें खाना लाकर देते हैं तभी वह पेट भर पाते हैं अन्यथा उन्हें भूखा ही रहना पड़ता है।

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बिहार से आई हुई एक महिला अपने पति का कैंसर का इलाज मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल के द्वारा करवा रही है। महिला ने बताया कि उन्हें यहां पर एक स्कूल में ठहरने के लिए जगह दी गई थी। परंतु अब लॉकडाउन हटने के बाद स्कूल भी खुलने लगी है इसलिए अब उन्हें स्कूल में भी रुकने की जगह से बाहर कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि उनका बेटा भी उनके साथ आया हुआ है जिसके कारण उसकी 1 साल की पढ़ाई का नुकसान हो चुका है।

फुटपाथ पर रहते हुए इन मरीजों को और उनके परिजनों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। मानसून के दिनों में तो इनकी परेशानियां और अधिक बढ़ जाती है। फुटपाथ पर रहते हुए इन मरीजों की सेहत पर और भी बुरा असर पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि यह लोग अस्पताल से दूर भी रहने के लिए जा नहीं सकते क्योंकि अस्पताल वाले कभी भी इन्हें उपचार के लिए बुला लेते हैं। ऐसे में इन मरीजों की परिस्थिति कितनी विकट हो सकती हैं इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता।

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