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6 साल की उम्र में इस सन्यासी से शिक्षा प्राप्त की थी रवि दहिया ने, ओलिंपिक में जीता सिल्वर मेडल

हर व्यक्ति के जीवन में गुरु का बहुत ही अहम रोल होता है। कोई भी व्यक्ति गुरु के बिना सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। हर किसी की सफलता के पीछे उसकी अपनी महेनत के साथ साथ उसके गुरु का बहुत अहम् योगदान होता है। गुरु ही हमारे जीवन को उचित मार्गनिर्देश देने का काम करते है और हमरे जीवन कों सही दिशा में मोड़ने का काम करते है। इस लेख में हम आपको ऐसे गुरु के बारे में बताने जा रहे है जिनके शिष्य ने आज पुरे भारत की छाती गर्व से चौड़ी कर दी। जीहा दोस्तों हम बात कर रहे हैं हाल ही में टोक्यो ओलिंपिक 2021 में कुश्ती में रजत पदक जितने वाले पहलवान रवि दहिया के बारे में।

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हाल ही में 57 किलोग्राम कुश्ती में, टोक्यो ओलिंपिक 2021 में रवि दहिया ने में बहुत अच्छा प्रदर्शन करते हुए रजत पदक जीतकर भारत का नाम रौशन किया है। रवि दहिया जापान से वापिस लौटते ही अपने गुरु का आशिर्वाद लेने उनके आश्रम पहुच गए। रवि दहीया के गुरु का नाम ब्रम्हचारी हंसराज है। आज तक से बात करते हुए रवि दहिया ने बताया की उनकी सफलता के पीछे उनके गुरु हंसराज का बहुत अहम योगदान है। रवि दहिया बचपन से ही गुरु हंसराज के आश्रम में कुश्ती सिखने जा रहे है। रवि ने अपनी उम्र के 6 साल से लेकर 12 साल तक गुरु हंसराज के मार्गदर्शन में कुश्ती सीखी। गुरु हंसराज का आश्रम रवि के घर से केवल 3 किलोमीटर ही दूर है।

रवि दहिया के गुरु हंसराज का जीवन बहुत ही सामन्य सा है। ओलिंपिक खिलाडीयो के बाकि कोच की तुलना में रवि दहिया के गुरु हंसराज बहुत ही साधारण जीवन जीते है। उन्होंने बहुत वर्ष पहले ही सन्यास ले लिया था। गुरु हंसराज के आश्रम में गांव के सभी बच्चे कुश्ती सिखने अनेक वर्षो से आ रहे है। आज तक से बात करते हुए गुरु हंसराज ने कहा की रवि दहिया के पिता उन्हें 6 वर्ष की आयु में ही उनके पास छोड़ गए थे और कहा था की इसे कुश्ती सिखाइये।

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जिसके बाद रवि ने 12 वर्ष की आयु तक हंसराज के पास ही कुश्ती की शिक्षा प्राप्त की। बाद में गुरु हंसराज ने उन्हें विश्व स्तरीय ट्रेनिंग लेने के लिए छत्रसाल स्टेडियम में भेज दिया। गुरु हंसराज ने बताया की जब उन्हें ओलिंपिक में रवि की जित के बारे में पता चला तो वे बहुत खुश हूए। और उन्हें रवि पर बहुत गर्व हुआ।

गुरु हंसराज कहते है की वे तो सन्यास लेकर एकांत वास में रहना चाहते थे परंतु कुछ लोगो ने उनके पास आकर उन्हें कुश्ती सिखाने के लिए विनती की और बाद में बहुत से पालको ने अपने बच्चों को हंसराज के पास कुश्ती सिखाने के लिए भेजा। लोग उन्हें कुश्ती सिखाने के बदले फ़ीस भी देना चाहते थे परंतु उन्होंने फ़ीस न लेते हुए कहा की उन्हें बदले में कुछ नहीं चाहिए। उनके छात्र देश का नाम रौशन कर रहे है यही उनके लिए काफी है। गुरु हंसराज के आश्रम में बहुत से ऐसे कुश्ती पहलवान है जो की बहुत उत्तम कुश्ती करते है।

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