चाणक्य नीति: इंसान की एक आदत उसे पूरा बर्बाद कर देती है, धन भी खा जाती है

चाणक्य को अब तक के जन्मे सबसे अधिक बुद्धिमान और दूरदर्शी लोगो में से एक गिना जाता रहा है और कही न कही इस बारे में कम लोग ही जानते है. खैर अब जो भी है इन चीजो को लेकर के अपने अपने विचार होते है और उनको वो अपने हिसाब से रखते भी है ये हम लोगो ने देखा है. खैर जो भी है अभी के लिए हम लोग बात कर रहे है एक ऐसी आदत की जिसके बारे में अधिकतर लोगो को पता ही नही है, पर वो उनके मन का उनके दिलो दिमाग का हिस्सा बनी हुई है और अगर उनको नही बताया गया तो वो हमेशा बनी भी रहेगी.

अनवस्थितकायस्य न जने न वने सुखम्। जनो दहति संसर्गाद् वनं संगविवर्जनात। इस श्लोक का अर्थ है जिस भी व्यक्ति का चित्त स्थिर नही होता है वो न तो कभी भी लोगो के बीच में सुख की प्राप्ति करता है और न ही उसे वन में भी सुख मिलता है. ऐसे लोग अकेले रहते है तो भी उनका मन जलता रहता है.

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यहाँ पर मनुष्य की एक आदत की तरफ बात सामने रखी गयी है और वो आदत ये है कि आपका मन बिलकुल भी स्थिर नही रहता हिया और कही न कही ये काफी अधिक सही बात भी है. ऐसा व्यक्ति जिसका मन हमेशा उल जलूल चीजो में भटकता रहता है और कभी भी एक जगह पर स्थिर नही रहता है वो कभी भी टिककर के खुश नही रह सकता है और ये एक कडवा सत्य है जिसको मानकर के ही चलना चाहिए.

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आज दुनिया भर में चाहे कितने ही लोग हो उनके दुःख का सबसे बड़ा कारण यही है और अगर वो इस दुःख के कारण से पार पा जाते है तो फिर तो उनको खुश होने या फिर रहने से कोई भी रोक नही सकता है और ये बात अपने आप में सच है. ये बात तो आप भी जानते और समझते होंगे.

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Published by
Yuvraj Solanki

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