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अनाथ होने के बावजूद अपनी किस्मत को नहीं कोसा, IAS-IPS अफसर बने यह 5 लोग

दोस्तों हम में से कई लोग ऐसे होते हैं जो हमेशा से ही अपनी किस्मत का रोना रोते हुए जिंदगी की जंग में हार जाते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी मेहनत और लगन करने की क्षमता उन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचा ही देती है। किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उस दिशा में पूरी एकाग्रता से काम करने वाला व्यक्ति आखिरकार सफल हो ही जाता है फिर चाहे उसकी परिस्थिति उसके कितने भी पाव खींचने का प्रयास करें। इसलिए हम आपको ऐसे कुछ अफसरों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने अनाथ होने के बावजूद अपनी किस्मत पर रोते हुए ना बैठकर सफलता की बुलंदियों को छू कर दिखाया।

1. आईएएस किंजल सिंह

किंजल सिंह का जन्म साल 1982 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ था। उनके पिता के पी सिंह डीएसपी के पद पर तैनात थे। जब किंजल सिंह केवल 5 वर्ष की थी तब उनके पिता की हत्या कर दी गई थी। सीता की हत्या होने के 6 महीने बाद ही किंजल की मां ने एक दूसरी बेटी को भी जन्म दिया और उसका नाम प्रांजल रखा गया। दोनों ही बेटियों की जिम्मेदारी अकेले मां के कंधे पर आ गई थी वह गया लेकिन किंजल की मां ने दोनों ही बेटियों का पालन पोषण काफी अच्छे से किया। किंजल की मां हमेशा से चाहती थी कि उनकी बेटियां आईएएस अफसर बने।

कालांतर से आगे बढ़ते हुए साल 2004 में दुर्भाग्य से किंजल की मां की मौत हो गई। मां की मौत के बाद अपनी छोटी बहन प्रांजल की भी जिम्मेदारी अब किंजल के कंधों पर आ गई। लेकिन किंजल अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित की और अपनी मां का सपना पूरा करने के लिए वह लगातार प्रयास कर रही थी। साल 2008 में किंजल ने आईएएस की परीक्षा पास कर ली और वे कलेक्टर बन गई। इतना ही नहीं जब वे बहराइच में डीएम के पद पर तैनात थी उस समय साल 2013 के जून महीने में उन्होंने अपने पिता डीएसपी केपी सिंह के हत्यारों को भी सजा दिलवाई।

2. आईपीएस सूरज कुमार राय

उत्तर प्रदेश के जौनपुर में रहने वाले सूरज कुमार राय वैसे तो अपना करियर इंजीनियरिंग के क्षेत्र में बनाना चाहते थे और वे अच्छे इंजीनियर बनना चाहते थे। लेकिन किस्मत ने उनका ऐसा मोड़ लिया कि वह इंजीनियर ना बनते हुए आईपीएस ऑफिसर बन गए। दरअसल अपनी बारहवीं की कक्षा पास करने के बाद सूरज कुमार ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए प्रयागराज चले गए। प्रयागराज में पढ़ते समय ही उन्हें एक दुखद खबर सुनाई दी। खबर थी कि उनके पिता की हत्या कर दी गई।

अपने पिता की हत्या के सिलसिले में सूरज कुमार को पुलिस स्टेशन के कई चक्कर काटने पड़ते थे जहां पर उन्हें काफी तकलीफ हो से होकर गुजरना पड़ा। उस समय सूरज कुमार प्रशासन की ओर से ढीली व्यवस्था को देखकर काफी दुखी हुए और उन्होंने तय कर लिया कि अब इसी क्षेत्र में उतरकर सामान्य लोगों की समस्याओं को समझाने के लिए ही अपना जीवन समर्पित कर देंगे। इसलिए उन्होंने अपना ग्रेजुएशन कंप्लीट करने के बाद यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी और साल 2017 में ऑल इंडिया रैंक 117 प्राप्त कर आईपीएस ऑफिसर बन गए।

3. आईएएस अब्दुल नसर

आईएएस ऑफिसर अब्दुल नसर की भी जिंदगी काफी संघर्षों से भरी हुई रही। अब्दुल नसर छह भाई-बहनों में सबसे छोटे से। जब यह केवल 5 वर्ष के थे तब उनके पिता की मृत्यु हो गई थी और घर परिवार चलाने की पूरी जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई थी। उनकी मां भी आर्थिक रूप से इतने पैसे नहीं कमा पाती थी कि सभी बच्चों का पालन पोषण कर सके इसलिए उन्होंने अब्दुल नसर को अनाथ आश्रम में छोड़ दिया था। अनाथ आश्रम में रहते हुए ही अब्दुल नसर ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और आगे चलकर वे साल 2006 में आईएएस ऑफिसर बन गए। साल 2017 में अब्दुल नसर कोल्लम जिले के कलेक्टर के रूप में तैनात किए गए।

4. आईएएस मोहम्मद अली शिहाब

आईएएस मोहम्मद अली शिहाब की जिंदगी में भी बहुत ही लंबा संघर्ष जुड़ा रहा। आईएएस मोहम्मद अली शिहाब केरल के मल्लापुरम जिले के रहने वाले थे। बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया था जिसके बाद उनके परवरिश की जिम्मेदारी उनके मां के कंधों पर आ गई थी। अपने बच्चों का पालन पोषण करने में सक्षम नहीं होने के कारण मोहम्मद अली शिहाब की मां ने उन्हें अनाथ आश्रम में छोड़ दिया था। मोहम्मद अली शिहाब इस अनाथ आश्रम में 10 साल तक रहे और वही रहते हुए उन्होंने अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी की।

मोहम्मद अली शिहाब पढ़ने लिखने में काफी होशियार थे और वे कुछ बड़ा कर अपनी जिंदगी में सफल होना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मेहनत और लगन से अपनी पढ़ाई जारी रखी। बता दे कि मोहम्मद अली शिहाब वन विभाग सहित रेल टिकट परीक्षक और जेल वार्डन जैसी सरकारी क्षेत्रों की विभिन्न 21 परीक्षाओं को पास कर चुके थे। लेकिन उनका लक्ष्य था यूपीएससी। आखिरकार साल 2011 में मोहम्मद अली शिहाब ने अपने तीसरे प्रयास के दौरान यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली और ऑल इंडिया रैंक 226 प्राप्त कर लिया। यूपीएससी की परीक्षा पास करने के बाद मोहम्मद अली शिहाब को कोहिमा जिले में तैनाती मिली जो कि नागालैंड में है। 

5. आईएएस मिश्रा

आईएएस मिश्रा की भी जिंदगी का सफर काफी संघर्षों से भरा हुआ रहा। जब वे केवल 5 वर्ष के थे तब वे अनाथ हो गए थे और उसके बाद उनकी परवरिश उनके रिश्तेदारों के घर पर हुई। उनके रिश्तेदारों की भी आर्थिक परिस्थिति इतनी ठीक नहीं थी जिसके कारण उन्हें पढ़ाई में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद उनके रिश्तेदारों ने अपने हाथ खड़े कर लिए और उन्हें आगे की पढ़ाई करवाने से मना कर दिया। लेकिन मिश्रा जी आगे और पढ़ना चाहते थे। इसी दौरान उन्होंने अलाहाबाद से मिलने वाली स्कॉलरशिप के बारे में सुना। स्कॉलरशिप के चक्कर में अलाहाबाद चले गए।

वहां पर उन्होंने स्कॉलरशिप को पाने के लिए कड़ी मेहनत और लगन से पढ़ाई की। उसने सभी दिनों तक वे यूनिवर्सिटी के फर्श पर ही सो कर अपना गुजारा करते थे। आखिरकार उन्हें स्कॉलरशिप मिल गई और यूनिवर्सिटी में दाखिला भी मिल गया। अपनी मेहनत और लगन के बल पर मिश्रा जी यूनिवर्सिटी टॉपर भी रहे और उन्हें असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी मिल गई। परंतु इस नौकरी के दौरान ही उन्होंने सोचा कि यूपीएससी की तैयारी कर आईएएस बनने का प्रयास किया जाए। मिश्रा जी बाद में आईएएस बनने की दिशा में प्रयास करने लगे और वहां भी उनकी मेहनत रंग लाई जिसके बाद वे आईएएस बन गए।

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Harsh

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